या पानाचे मुद्रितशोधन झालेले नाही

१७९ फुटकर --- -=-

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-=-=-= -=-=------------------- नपार है। भूषन सिराज लौं परावने परत फेरि दिल्ली पर परति परिन्दन की छोर है ॥ ३१ ॥ (३१) हुहर पारे-हाहाक्कार करतो. सार-हरयार. लँदि डारे-कुचलन टाकले. बँदि-चूर्ण करून. खाक-माती. खादर-एक नदी. लौंपर्यंत. सक्कर, भक्कर, मक्कर-सिंध प्रांतातील गावें. साहू-शाहू. परिन्दन-पक्षी. छार-धूळ. परावते-पलायन. दोहा रेवा ते इत देत नाही, पत्थिक म्लेच्छ निवास । कहत लोग इन पुरनि मैं, है सरजा को त्रास ॥ ३२ ॥ (३२) इत=अलीकडे. पत्थिक-वाटसरू. पुरानिमें-गाँवति. को-चा. कवित्त मनहरण बाजि बम्ब चढो साजि बाजि जब कलाँ भूप गाजी महाराज राजी भूषन बखानते । चंडी की सहाय महि मंडी तेजताई पेड़ छंडी राय राजा जिन दंडी औनि आन ते ॥ मन्दी भूत रवि रज बन्दी भृत हठ धर नन्दी भूतपति भो अनंदी अनुमान ते । रङ्की भूत दुवन करङ्कीभूत दिगदंती पंकीभूत समुद सुलंकी के पयान ते ॥ ३३ ॥ (३३) कला-भोठा. ऐंड ॐडीऐट सोडून. औनि- पृथ्वी. रंकी–दरिद्री. भूत-झाले. दुवन-शत्रु. करंकी–कलंकित. समुद-समुद्र. रहत अछक पै मिटै न धक पीयन की निपट जु नॉगी डर काहू के डरे नहीं। भोजन बनावै नित चोखे खानखानन के सोनित पचावे तऊ उदर भरै नहीं ॥ उगिलत आसौ तऊ सुकल समर बीच राजै रावबुद्ध कर बिमुख परै नहीं ।। तेग या तिहारी मतवारी है अछक तौलौं जौलौं गजराजन की गज़क करे नहीं ॥ ३४ ॥